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विद्यालयों में स्थानीय संस्कृति पढ़ाने मुख्यमंत्री से सिद्धार्थ महाजन ने की मांग

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ब्यूरो चीफ बन्नूराम यादव कोंडागांव । कोंडागांव, बस्तर विकास एवं सेवा संस्थान द्वारा संचालित बस्तर संस्कृति ग्रुप (लोकरंग) के संयोजक सिद्धार्थ महाजन ने मुख्यमंत्री के नाम पत्र भेजकर प्रदेश के सभी शासकीय एवं निजी विद्यालयों में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं, लोककलाओं और स्थानीय त्योहारों को शिक्षा से जोड़ने की मांग की है। पत्र की प्रतिलिपि स्कूल शिक्षा मंत्री को भी प्रेषित की गई है।

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की पहल

पत्र में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, जनजातीय विरासत, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों के कारण देशभर में विशिष्ट पहचान रखता है। बदलती जीवनशैली, आधुनिक तकनीक और मोबाइल संस्कृति के प्रभाव से नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है। ऐसे में विद्यालय स्तर पर सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।

स्थानीय पर्व और लोककलाओं से कराया जाए परिचय

सिद्धार्थ महाजन ने सुझाव दिया है कि विद्यालयों में हरेली, पोला, तीजा, छेरछेरा, मड़ई, बस्तर दशहरा, नवाखाई और गोंचा जैसे प्रमुख पर्वों का महत्व विद्यार्थियों को बताया जाए। साथ ही पंथी, राउत नाचा, सुआ, करमा, गेंड़ी, पंडवानी, ददरिया, लोकगीत, ढोकरा शिल्प, बांस एवं लकड़ी की हस्तकलाओं तथा जनजातीय संस्कृति का व्यावहारिक परिचय भी कराया जाए।

वीर शहीदों और महान विभूतियों पर हों विशेष कार्यक्रम

पत्र में विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना विकसित करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ एवं देश के वीर शहीदों तथा महान विभूतियों के जीवन और योगदान पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है।

‘अपनी संस्कृति–अपनी पहचान’ कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव

उन्होंने प्रत्येक विद्यालय में प्रतिमाह “अपनी संस्कृति–अपनी पहचान” विषय पर सांस्कृतिक परिचय कार्यक्रम, लोक कलाकारों के व्याख्यान, लोककला प्रदर्शनियां, सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं तथा जनजातीय संस्कृति आधारित गतिविधियां आयोजित करने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि इससे विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना मजबूत होगी।

राज्य सरकार से दिशा-निर्देश जारी करने की मांग

सिद्धार्थ महाजन ने राज्य शासन से आग्रह किया है कि इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर प्रदेश के सभी विद्यालयों में नियमित सांस्कृतिक गतिविधियां प्रारंभ की जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से जुड़ी रहें।

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