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बस्तर ओलम्पिक से निखर रही ग्रामीण युवाओं की प्रतिभा, खेल के मैदान में संवर रहे भविष्य के सपने

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दूरस्थ अंचलों के युवाओं को मिला अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच, कोई बनना चाहता है खिलाड़ी तो किसी का सपना सेना में जाने का

ब्यूरो चीफ बन्नूराम यादव कोण्डागांव। कोण्डागांव, बस्तर के दूरस्थ और ग्रामीण अंचलों में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो उन्हें सही अवसर और बेहतर मंच उपलब्ध कराने की। इसी उद्देश्य को साकार करने की दिशा में बस्तर ओलम्पिक ग्रामीण युवाओं के लिए उम्मीद और उत्साह का नया माध्यम बनकर उभर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में आयोजित इस खेल प्रतियोगिता के माध्यम से बस्तर संभाग के युवाओं को अपनी खेल प्रतिभा प्रदर्शित करने, उसे निखारने और आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है।

कभी गांव की गलियों और स्कूलों के मैदान तक सीमित रहने वाले युवा आज बड़े खेल आयोजनों में अपनी भागीदारी दर्ज करा रहे हैं। बस्तर ओलम्पिक उनके लिए केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपने सपनों को नई दिशा देने का मंच बन रहा है।

खो-खो प्रतियोगिता में शामिल होकर उत्साहित हुए सोनू सोरी

ग्राम बयानार निवासी सोनू सोरी वर्तमान में गुंडाधुर महाविद्यालय में बीए तृतीय सेमेस्टर के छात्र हैं। वे एसएससी जीडी भर्ती की तैयारी भी कर रहे हैं। उन्होंने बस्तर ओलम्पिक में खो-खो प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।

सोनू बताते हैं कि बस्तर ओलम्पिक में शामिल होकर उन्हें काफी अच्छा लगा। उनके अनुसार, यह आयोजन ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को अपनी खेल प्रतिभा सामने लाने और आगे बढ़ने का बेहतर अवसर प्रदान कर रहा है।

कबड्डी, खो-खो और वॉलीबॉल में सदन पोयाम ने दिखाया उत्साह

ग्राम धनसूली निवासी सदन पोयाम वर्तमान में कोण्डागांव में रहकर जीवन दीप एकेडमी में बस्तर फाइटर भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने बस्तर ओलम्पिक में कबड्डी, खो-खो और वॉलीबॉल प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

सदन का कहना है कि इस आयोजन से उन्हें अलग-अलग खेलों में अपनी प्रतिभा आजमाने और उसे निखारने का अवसर मिला है। उनके लिए बस्तर ओलम्पिक खेल के साथ-साथ आत्मविश्वास बढ़ाने का भी माध्यम बना है।

बेहतर क्रिकेटर बनने का सपना संजोए हैं रितेश नेताम

ग्राम चिचडोंगरी निवासी कक्षा 12वीं के छात्र रितेश नेताम ने वॉलीबॉल प्रतियोगिता में भाग लिया। रितेश बताते हैं कि उन्हें बस्तर ओलम्पिक का बेसब्री से इंतजार था, क्योंकि वे पिछले आयोजन में भी शामिल हुए थे।

रितेश का सपना एक बेहतर क्रिकेटर बनने का है। उनका मानना है कि बस्तर ओलम्पिक जैसे आयोजन ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करते हैं और उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

बयानार छात्रावास के विद्यार्थियों ने भी दिखाया दमखम

बयानार छात्रावास में रहकर पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी बस्तर ओलम्पिक एक खास अनुभव लेकर आया। छात्रावास के मनोज कुमार, संतु सोरी, संजय नेताम, उमेश सोरी, विष्णु नेताम, सुखसिंह मंडावी, रंजित कोर्राम, सहदेव कोर्राम, टिकेश्वर, दीवान, विमेश मंडावी, महेश सलाम और जोरा सोरी ने खो-खो प्रतियोगिता में भाग लिया।

दूरस्थ क्षेत्र से आकर छात्रावास में पढ़ाई कर रहे इन विद्यार्थियों के लिए यह प्रतियोगिता अपनी क्षमता दिखाने और बड़े स्तर पर खेलने का अवसर बनी।

कोई बनना चाहता है खेल प्रशिक्षक, तो किसी का सपना सेना में भर्ती होना

इन विद्यार्थियों की आंखों में भविष्य को लेकर अलग-अलग सपने हैं। कोई खेल के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है, तो कोई सेना में भर्ती होकर देश की सुरक्षा में योगदान देने का सपना देखता है।

छात्र टिकेश्वर ने बस्तर ओलम्पिक में भाग लेने के बाद भविष्य में खेल प्रशिक्षक यानी कोच बनने का सपना संजोया है। वहीं छात्रावास के कई विद्यार्थी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते हैं। इन युवाओं के लिए खेल का मैदान केवल प्रतिस्पर्धा का स्थान नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचानने और भविष्य की दिशा तय करने का माध्यम बन रहा है।

ग्रामीण प्रतिभाओं को मिल रहा आगे बढ़ने का अवसर

बस्तर ओलम्पिक की विशेषता यह है कि इसके माध्यम से दूरस्थ गांवों के उन बच्चों और युवाओं को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है, जिन्हें अक्सर पर्याप्त खेल सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते।

ऐसे आयोजनों से ग्रामीण खिलाड़ियों को बेहतर माहौल, अन्य खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने, अपनी कमियों को समझने और नए अनुभव हासिल करने का अवसर मिलता है।

खेल के मैदान से नई उम्मीदों को मिल रही उड़ान

बस्तर ओलम्पिक में हिस्सा लेने वाले इन युवाओं के सपने भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उन्हें पूरा करने की उम्मीद एक जैसी है। यह आयोजन उन्हें अपनी प्रतिभा पर भरोसा करने और आगे बढ़ने का हौसला दे रहा है।

इन युवाओं की कहानियां बताती हैं कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या संसाधनों की मोहताज नहीं होती। यदि सही अवसर और प्रोत्साहन मिले तो दूरस्थ गांवों से भी खिलाड़ी अपनी पहचान बना सकते हैं। बस्तर ओलम्पिक इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ग्रामीण युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने का मंच बन रहा है।

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