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जानिए क्यों निकाली जाती है?- जगन्नाथ यात्रा

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भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है, जहाँ प्रत्येक राज्य, समुदाय और संस्कृति की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। इन्हीं धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में से एक अत्यंत प्रसिद्ध और पवित्र परंपरा है – जगन्नाथ यात्रा, जिसे ‘रथ यात्रा’ भी कहा जाता है। यह यात्रा भगवान श्रीकृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ जुड़ी हुई है और ओडिशा के पुरी नगर में हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को बड़े धूमधाम से निकाली जाती है।



जगन्नाथ यात्रा का धार्मिक महत्व:

पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक है और वैष्णव धर्म के अनुयायियों के लिए यह अत्यंत पवित्र तीर्थ है। “जगन्नाथ” शब्द का अर्थ होता है – जगत के नाथ यानी सम्पूर्ण संसार के भगवान। भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का ही रूप माना जाता है। मान्यता है कि यह रथयात्रा उस प्रसंग को दर्शाती है जब भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा मथुरा से द्वारका की ओर जाते हैं। इसे प्रतीकात्मक रूप में हर वर्ष पुरी में दो किमी की दूरी तय करके गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है।

रथयात्रा का ऐतिहासिक और पौराणिक आधार:

रथयात्रा की पृष्ठभूमि अनेक धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में वर्णित है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में जगन्नाथ यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। एक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने एक बार इच्छा जताई कि वह पुरी नगर घूमना चाहती हैं। तब बलराम और श्रीकृष्ण ने उन्हें रथ पर बैठाकर यात्रा करवाई। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष यह यात्रा निकाली जाती है।

दूसरी मान्यता के अनुसार, रथयात्रा उस घटना का प्रतीक है जब माता यशोदा ने श्रीकृष्ण से नाराज होकर उन्हें नंदगाँव से मथुरा भेजा था। श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा को जब उनकी मौसी के घर भेजा गया, तब वे रथ में सवार होकर गए थे। उसी दृश्य को यह यात्रा दोहराती है।




रथयात्रा की भव्यता और आयोजन:

पुरी की रथयात्रा दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी धार्मिक यात्राओं में से एक है। इस यात्रा में तीन अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं:

1. भगवान जगन्नाथ का रथ – नन्दिघोष: यह रथ 45.6 फीट ऊँचा होता है और इसमें 16 पहिए होते हैं। इसे लाल और पीले रंग से सजाया जाता है।


2. बलभद्र का रथ – तालध्वज: इसकी ऊँचाई 44 फीट होती है और इसमें 14 पहिए होते हैं। इसका रंग हरा और लाल होता है।


3. सुभद्रा का रथ – दर्पदलन: यह रथ 43 फीट ऊँचा होता है और इसमें 12 पहिए होते हैं। इसे काले और लाल रंग से सजाया जाता है।

तीनों रथों को हजारों श्रद्धालु रस्सियों से खींचते हैं, और यह कार्य “पुण्य का कार्य” माना जाता है। मान्यता है कि रथ खींचने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गुंडिचा मंदिर का महत्व:
रथयात्रा का अंतिम पड़ाव होता है गुंडिचा मंदिर, जो कि पुरी मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित है। इसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यात्रा के दौरान भगवान 9 दिनों तक इस मंदिर में विश्राम करते हैं, जिसे ‘गुंडिचा उत्सव’ कहा जाता है। इसके बाद भगवान वापस जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं, जिसे ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है।

रथयात्रा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:
जगन्नाथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, यह सामाजिक समरसता और समानता का प्रतीक भी है। इस दिन हर जाति, वर्ग और संप्रदाय के लोग एक साथ आकर भगवान के रथ को खींचते हैं। यह आयोजन भारतीय संस्कृति की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को साकार करता है। पुरी की रथयात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं, जिससे यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रसिद्ध हो चुका है।

वर्तमान संदर्भ में रथयात्रा:

वर्तमान में जगन्नाथ यात्रा तकनीक और मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया में प्रसारित होती है। टीवी चैनल, यूट्यूब लाइव और सोशल मीडिया के माध्यम से करोड़ों लोग इस यात्रा का सीधा दर्शन करते हैं। कई राज्यों और देशों में भी रथयात्रा की नकल की जाती है, जैसे – अहमदाबाद, मुंबई, कोलकाता, लंदन और न्यूयॉर्क आदि।



जगन्नाथ यात्रा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम, एकता और संस्कृति का संगम है। यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं और सबका कल्याण चाहते हैं। हर वर्ष की रथयात्रा मानवीय मूल्यों की पुनःस्थापना का अवसर बनकर आती है। इसमें भाग लेना, दर्शन करना और सेवा करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

इसलिए, जगन्नाथ यात्रा निकाली जाती है – ईश्वर के प्रति श्रद्धा, परंपरा की रक्षा और समाज में भाईचारे की भावना को पुष्ट करने के लिए।

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