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हिमालय का बदला स्वरूप शिक्षिका सुशीला की नजरों में बना चिंता का विषय

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31 वर्षों बाद ग्रेटर हिमालय पहुंचीं शिक्षिका सुशीला, ग्लेशियरों में बदलाव देख पर्यावरण संरक्षण को लेकर जताई चिंता

ब्यूरो चीफ बन्नूराम यादव कोंडागांव। कोंडागांव, समय के साथ केवल तारीखें नहीं बदलतीं, बल्कि जीवन को देखने का नजरिया और अनुभव भी बदलते हैं। वर्ष 1994-95 में कॉलेज छात्रा के रूप में ग्रेटर हिमालय की यात्रा करने वाली शिक्षिका सुशीला जब 31 वर्ष बाद वर्ष 2026 में पुनः वृहद हिमालय की सफेद बर्फानी चोटियों के सामने पहुंचीं, तो यह यात्रा उनके लिए महज भौगोलिक भ्रमण नहीं, बल्कि अनुभव, चेतना और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का सफर बन गई।

कॉलेज के दिनों की यादों से वर्तमान तक

वर्ष 1994-95 में कॉलेज की छात्रा रहते हुए दोस्तों के साथ हिमालय की यात्रा उनके लिए किसी सपने जैसी थी। बसों में गूंजते गाने, कैमरे में तस्वीरें कैद करना और बर्फ के गोले बनाकर एक-दूसरे के साथ मस्ती करना उस यात्रा की खास यादें थीं। उस समय शिक्षिका द्वारा पढ़ाए गए भूगोल के नियम परीक्षा की तैयारी का हिस्सा भर लगते थे। तब यह कल्पना भी नहीं थी कि आगे चलकर वे स्वयं शिक्षिका की भूमिका निभाएंगी और प्रकृति को विद्यार्थियों के सामने एक जीवंत पाठशाला के रूप में समझाएंगी।

अब हिमालय बना जीवंत श्यामपट

वर्ष 2026 में जब सुशीला दोबारा वृहद हिमालय पहुंचीं तो तीन दशकों के अनुभव ने प्रकृति को देखने का उनका नजरिया बदल दिया। अब वे हिमालय को केवल पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत पाठशाला के रूप में देखती हैं।

उनके अनुसार हिमालय की नदियां बाधाओं को पार कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं, पहाड़ विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का संदेश देते हैं और चीड़ के पेड़ कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति सकारात्मकता का प्रतीक दिखाई देते हैं। शिक्षण के अपने सफर में शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अनंतपुर, माकड़ी की छात्रा कुंती पोयाम सहित अन्य विद्यार्थियों से मिले अनुभवों ने भी उनके जीवन और शिक्षण दृष्टिकोण को समृद्ध किया है।

ग्लेशियरों में बदलाव ने बढ़ाई पर्यावरण की चिंता

तीन दशक के अंतराल के बाद हिमालय पहुंचने पर सुशीला ने ग्लेशियरों और पर्वतीय क्षेत्रों के स्वरूप में आए बदलाव को महसूस किया। उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग, अनियंत्रित विकास और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालयी पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

उनका कहना है कि प्रकृति के प्रति हमारी लापरवाही का असर अब हिमालय जैसे विशाल पर्वत क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। ग्लेशियरों के सिकुड़ने और बदलते स्वरूप को देखकर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी और अधिक गंभीर महसूस होती है। एक शिक्षिका के रूप में यह अनुभव उन्हें अपने विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

बस्तर की गढ़वा कला से लेखक गांव तक जुड़ा रिश्ता

इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव उत्तराखंड का ‘लेखक गांव’ रहा। कोंडागांव अपनी गढ़वा कला और अद्भुत शिल्प परंपरा के लिए जाना जाता है। ऐसे में लेखक गांव पहुंचकर सुशीला का जुड़ाव वहां की साहित्यिक और रचनात्मक संस्कृति से और गहरा हुआ।

हिमालय की तलहटी में बसे इस गांव में देश-दुनिया के साहित्यकारों और लेखकों के रचनात्मक चिंतन से परिचित होने का अवसर मिला। उन्होंने महसूस किया कि यह स्थान साहित्य, विचार और रचनात्मक ऊर्जा का अनूठा संगम है, जिसने उनके विचारों को भी नई दिशा दी।

31 वर्षों का सफर बना चेतना का सफर

कोंडागांव से वृहद हिमालय तक 31 वर्षों का यह सफर सुशीला के लिए केवल दूरी तय करने की यात्रा नहीं, बल्कि चेतना और अनुभव का सफर बन गया। वर्ष 1994-95 में वे हिमालय से खूबसूरत यादें लेकर लौटी थीं, जबकि वर्ष 2026 की यात्रा से वे लेखक गांव की साहित्यिक ऊर्जा, हिमालय के धैर्य और पर्यावरण संरक्षण के दृढ़ संकल्प को साथ लेकर लौट रही हैं।

अब उनके लिए कक्षा का ब्लैकबोर्ड केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हिमालय से जुड़ा अनुभव, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी विद्यार्थियों तक पहुंचेगा।

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