पितेश्वर हरपाल गरियाबंद/राजिम। तीन नदियों के पावन संगम पर करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित सस्पेंशन ब्रिज इन दिनों पूरी तरह अंधेरे में डूबा हुआ है। यह अंधेरा सिर्फ लाइटिंग का नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर नाकामी और जिम्मेदार विभागों की लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। नववर्ष के अवसर पर जब हजारों श्रद्धालु त्रिवेणी संगम पहुंचे, तब यह बहुप्रचारित विकास परियोजना मोबाइल फोन की फ्लैश लाइट के सहारे चलती नजर आई।
श्रद्धालुओं की आस्था पर खतरा
स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं का कहना है कि यह सस्पेंशन ब्रिज केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था का अभाव किसी बड़े हादसे को खुला न्योता देने जैसा है। अंधेरा, भारी भीड़ और नदी के ऊपर बना पुल—तीनों मिलकर किसी भी समय जानलेवा स्थिति पैदा कर सकते हैं।
हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन?
श्रद्धालुओं ने सवाल उठाया है कि यदि अंधेरे के कारण कोई दुर्घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? त्रिवेणी संगम जैसे पवित्र स्थल पर इस तरह की घोर लापरवाही अधिकारियों की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
रखरखाव की पोल खोलती स्थिति
करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए सस्पेंशन ब्रिज की लाइटिंग व्यवस्था का इस तरह ठप हो जाना यह दर्शाता है कि निर्माण के बाद रखरखाव को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे न केवल आम जनता में नाराजगी है, बल्कि सरकार की विकासशील छवि को भी गहरा नुकसान पहुंच रहा है।
पहले भी दी गई थी जानकारी, फिर भी चुप्पी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस समस्या की जानकारी संबंधित विभागों को पहले भी दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जल संसाधन विभाग और निर्माण एजेंसियों की निष्क्रियता के कारण श्रद्धालुओं को जोखिम उठाकर पुल पार करना पड़ रहा है। विशेषकर रात के समय बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कार्रवाई और जांच की मांग
स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं ने प्रशासन से मांग की है कि जल संसाधन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए। साथ ही सस्पेंशन ब्रिज की लाइटिंग व्यवस्था को अविलंब दुरुस्त कर नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए। पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना में लापरवाही किस स्तर पर हुई।
अंधेरा सिर्फ बिजली का नहीं, भरोसे का भी
अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन इस चेतावनी को गंभीरता से लेता है या किसी बड़े हादसे के बाद ही जागता है। त्रिवेणी संगम जैसे आस्था के केंद्र पर फैला यह अंधेरा केवल रोशनी का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का भी है—और इसे दूर करना अब शासन-प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन चुकी है।








