पितेश्वर हरपाल गरियाबंद। आदिवासी विकासखण्ड मैनपुर क्षेत्र के घने जंगलों में बसे ग्राम डूमरघाट के हालात आज भी विकास के दावों की पोल खोल रहे हैं। आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी यह गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। पक्की सड़क, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र और शिक्षा जैसी आवश्यक सुविधाएं यहां अब तक नहीं पहुंची हैं।
सड़क नहीं, मरीजों को खाट पर ले जाते ग्रामीण

डूमरघाट गांव मैनपुर तहसील मुख्यालय से मात्र 12 किलोमीटर दूर है, लेकिन वहां तक कोई सड़क नहीं बन पाई है। गांव तक 108 संजीवनी या 102 महतारी एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती। बीमार व्यक्ति या गर्भवती महिलाओं को ग्रामीण खाट या कांवर में बैठाकर मीलों पैदल मैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक ले जाने को मजबूर हैं।
हर बारिश में नदी का कटाव बढ़ा खतरा
गांव से होकर गुजरने वाली तौरेंगा नदी हर साल बारिश में कटाव से गांव की जमीन को निगलती जा रही है। ग्रामीण तटबंध और स्टॉप डैम बनाने की मांग वर्षों से कर रहे हैं, पर अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। बारिश के दिनों में लोगों को जान-माल का डर बना रहता है।
सड़क निर्माण के नाम पर लाखों खर्च, लेकिन सड़क गायब

ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले 5-6 वर्षों में मनरेगा और अन्य योजनाओं से लाखों रुपए खर्च दिखाए गए, लेकिन आज भी सड़क कच्ची है। सात किलोमीटर का रास्ता गहरे गड्ढों में तब्दील है। मोटरसाइकिल चलाना तो दूर, पैदल चलना भी जान जोखिम में डालने जैसा है। ग्रामीणों ने अपने पैसे से कुछ हिस्सों की मरम्मत की है।
स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था बदहाल

गांव में कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। इन दिनों सर्दी, खांसी और बुखार का प्रकोप है। प्राथमिक और मिडिल स्कूल में 21 विद्यार्थी हैं, लेकिन स्कूल भवन जर्जर हालत में है। नया भवन स्वीकृत हुआ था, पर निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया है। रास्ता खराब होने से अधिकांश बच्चे आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।
बिजली की रोशनी आज तक नहीं पहुंची
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 12 वर्ष पहले बिजली लगाने की घोषणा की थी, पर आज भी गांव अंधेरे में डूबा हुआ है। सौर ऊर्जा प्रणाली भी फ्लॉप साबित हो चुकी है। ग्रामीणों को राशन, पेंशन और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए मीलों पैदल चलकर मैनपुर आना पड़ता है।
अधिकारियों की बेरुखी से ग्रामीण नाराज
ग्रामीणों ने बताया कि यहां सीईओ, बीईओ या डॉक्टर तक नहीं पहुंचते। सरपंच और सचिव भी गांव का हाल देखने नहीं आते। निर्माण कार्य जैसे सीसी रोड, रंगमंच या शौचालय अधूरे हैं। प्रधानमंत्री आवास की स्वीकृति के बाद भी सड़क खराब होने से निर्माण सामग्री नहीं पहुंच पाती।
ग्रामीणों की फरियाद — सड़क और बिजली मिले

गांव के बुजुर्ग अमरसिंह, पलटन कमार, भक्तिराम, कुशल और अन्य ग्रामीणों ने कहा कि वे जल्द ही गरियाबंद कलेक्टर से मुलाकात कर सड़क और बिजली की समस्या उठाएंगे। जनपद सदस्य सुकचंद ध्रुव ने भी कहा कि डूमरघाट के लोगों को मूलभूत सुविधाएं दिलाने के लिए वे जिला प्रशासन से मांग करेंगे।
“विकास के वादों के बीच डूमरघाट अब भी अंधेरे में”
डूमरघाट का यह हाल दिखाता है कि सरकार की योजनाएं और घोषणाएं कागज़ों पर सीमित रह गई हैं। सड़क, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना यह गांव आज भी विकास से कोसों दूर है।








