दल्ली राजहरा से अंकित टाटिया की रिपोर्ट
बालोद। शहर में हुए सड़क हादसे ने न केवल एक मजदूर परिवार की जिंदगी को संकट में डाल दिया, बल्कि ट्रैफिक व्यवस्था और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ट्रैफिक पुलिस की भूमिका पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर के हर चौक-चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस तैनात रहती है। इसके बावजूद नाबालिग बिना हेलमेट और बिना लाइसेंस स्कूटी चलाता रहा। नियमों की ऐसी अनदेखी से यह स्पष्ट सवाल उठ रहा है कि आखिर ट्रैफिक पुलिस की तैनाती का उद्देश्य क्या है?
मजदूर परिवार की पीड़ा
हादसे में घायल धरम दास यादव का परिवार मजदूरी पर निर्भर है। परिवार का कहना है कि यदि उनकी जान चली जाती या वे अपंग हो जाते तो बच्चों और परिवार का पालन-पोषण कैसे होता। पीड़ित परिवार आर्थिक संकट और मानसिक पीड़ा से गुजर रहा है।
प्रशासनिक चुप्पी और दोहरे कानून पर सवाल
घटना के बाद न तो पुलिस अधिकारियों और न ही प्रशासनिक अफसरों ने पीड़ित परिवार की सुध ली। लोगों का आरोप है कि यदि यही गलती किसी आम नागरिक से हुई होती तो अब तक उस पर कड़ी कार्रवाई हो चुकी होती। लेकिन चूंकि मामला एक पुलिस अधिकारी के नाबालिग बेटे से जुड़ा है, इसलिए प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है।
बालोद जिले में दोहरा रवैया?
बालोद जिले में आम लोगों पर बिना हेलमेट चालान की कार्रवाई सख्ती से की जाती है। पेट्रोल पंप तक पर बिना हेलमेट पेट्रोल नहीं दिया जाता। गांव से शहर आने वाले लोग चालान से परेशान हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या कानून केवल आम जनता के लिए है और अधिकारियों के परिवार पर लागू नहीं होता?
मामले पर संदेह और न्याय की उम्मीद
अब तक इस मामले में कोई अपराध दर्ज नहीं किया गया है। स्थानीय लोग आशंका जता रहे हैं कि आरोपी नाबालिग का संबंध पुलिस अधिकारी से होने के कारण पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा या नहीं, यह देखना बाकी है।
यह खबर पीड़ित परिवार की स्थिति, प्रशासनिक उदासीनता और कानून की समानता पर सवाल खड़ा करती है, जो पत्रकारिता की जिम्मेदारी का मूल आधार है।








