जनता के आंदोलन के आगे झुका प्रशासन — सालों से उपेक्षित सड़क पर अब शुरू हुआ मरम्मत कार्य…
कवर्धा।
कहते हैं कि जब सत्ता गूंगी-बहरी हो जाए, तो जनता को चिल्लाना पड़ता है। कुछ ऐसा ही हुआ है छत्तीसगढ़ के कवर्धा ज़िले में, जहां रायपुर से जबलपुर को जोड़ने वाली मुख्य सड़क की बदहाली पर वर्षों से जनता त्रस्त थी, लेकिन शासन-प्रशासन का एक भी जिम्मेदार अधिकारी झांकने नहीं आया।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा जी के शपथ ग्रहण के बाद से ही जनता को उम्मीद थी कि अब उनके क्षेत्र में बदलाव आएगा। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही निकली — क्षेत्र में न केवल अपराध बढ़े बल्कि प्रशासनिक ढिलाई भी चरम पर पहुंच गई।
खस्ताहाल सड़कें, टूटी पुलिया और गड्ढों में तब्दील हो चुकी हाईवे जैसी स्थिति को देखकर जब लोगों का सब्र टूट गया, तो उन्होंने अनोखा और जबरदस्त प्रदर्शन किया। प्लेकार्ड्स, बैनर और नारों के साथ आम नागरिकों ने इस बुनियादी मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर सरकार को सीधा संदेश दिया — “अब नहीं तो कभी नहीं।”
आंदोलन का असर — प्रशासन की टूटी नींद
प्रदर्शन के अगले ही दिन से कवर्धा जिला प्रशासन की नींद टूटी और आनन-फानन में सड़क मरम्मत कार्य शुरू करवा दिया गया। इससे यह साफ हो गया कि अगर जनता एकजुट हो जाए, तो सरकारें भी झुकती हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि ये जनता की मजबूरी थी जो आक्रोश बनकर बाहर आई।
> “हमने नेताओं से नहीं, अपने हक से सवाल किया। ये सड़क हमारी जरूरत है, चुनावी वादा नहीं,” — एक प्रदर्शनकारी युवा ने कहा।
प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
विपक्ष के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों ने उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि क्षेत्रीय विधायक और उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्होंने इस मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं की, जबकि यह मार्ग राज्य की प्रमुख लाइफलाइन माना जाता है।
> “नेता जी को कभी इस सड़क पर बगैर काफिले के चलना चाहिए, तब उन्हें असल दर्द का एहसास होगा,” — स्थानीय दुकानदार ने कहा।
अब मरम्मत शुरू — लेकिन भरोसा टूटा
हालांकि सड़क मरम्मत शुरू हो चुकी है, लेकिन नागरिकों का भरोसा टूट चुका है। उनका कहना है कि ये मरम्मत चुनावी दबाव या जनता की एकता का असर है, न कि सरकार की संवेदनशीलता का।
—
✊ जनता की एकजुटता जीत गई, सत्ता को झुकना पड़ा
यह घटना एक उदाहरण है कि लोकतंत्र में जनता ही असली ताकत होती है। अगर आवाज बुलंद हो, तो व्यवस्था भी सुनती है।
कवर्धा की जनता को इस सफल आंदोलन के लिए बधाई, लेकिन असली जंग तो अब शुरू हुई है — जवाबदेह और संवेदनशील प्रशासन की स्थापना के लिए
कवर्धा- झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!








