भिलाई ।जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र (सेक्टर-9) की एडवांस बर्न यूनिट ने असंभव को संभव करते हुए राजनांदगांव के 35 वर्षीय उमेश कुमार को नया जीवन दिया। महीनों तक दर्द, निराशा और गंभीर जलन के बाद जब सभी अस्पताल उम्मीद छोड़ चुके थे, तब बीएसपी के सेक्टर-9 बर्न सेंटर ने उनकी जिंदगी में प्रकाश वापस ला दिया।
आग की घटना ने बदल दी जिंदगी
सात फरवरी 2025 को घर में आग तापते समय नींद में आग में गिर जाने से उमेश 40% तक गंभीर रूप से जल गए। कई अस्पतालों में इलाज के बाद भी घाव नहीं भर रहे थे और दोनों हाथ कंधे और छाती से चिपक चुके थे। वह खुद से खाना, कपड़े पहनना तक नहीं कर पा रहे थे। मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वे आत्महत्या तक सोच चुके थे।
जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय बना जीवन की आखिरी उम्मीद
एक पूर्व मरीज की सलाह पर उमेश 18 अगस्त 2025 को जे.एल.एन. चिकित्सालय पहुँचे। परीक्षण में पाया गया कि उनकी हालत बेहद जटिल है
- दोनों कंधे छाती से जुड़े
- कोहनियाँ पूरी तरह मुड़ी
- खून और प्रोटीन की भारी कमी
- गहरे जले घाव
पहला बड़ा ऑपरेशन जीवन की दिशा बदलने वाला क्षण
26 अगस्त को बर्न विभाग प्रमुख डॉ. उदय कुमार के नेतृत्व में डॉ. अनिरुद्ध मेने और टीम ने अत्यंत जोखिमपूर्ण सर्जरी की। नसों और रक्त वाहिनियों के जुड़ाव के खतरे के बावजूद स्किन ग्राफ्टिंग सफल रही और उमेश का एक हाथ फिर से चलने लगा।
दूसरी सर्जरी – फिर खुली जीवन की पकड़
25 सितंबर 2025 को पुनः भर्ती कर दूसरे हाथ की सर्जरी की गई। पैरों की त्वचा से ग्राफ्टिंग कर कोहनी और कंधे का मोड़ सुधारा गया। कुछ ही हफ्तों में दोनों हाथ खुल गए और उमेश धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौटने लगे।
अब आत्मनिर्भर परिवार के लिए फिर से सहारा
उमेश ने भावुक होकर कहा
“इस अस्पताल ने मेरी नहीं, मेरे पूरे परिवार की जिंदगी बचाई। आज मैं फिर से अपने बच्चों के लिए पिता बन सका हूँ।”
उनकी पत्नी ने बीएसपी प्रबंधन को “परिवार का भगवान” बताया।
टीमवर्क का अनूठा उदाहरण
जटिल ऑपरेशन में
- डॉ. विनीता द्विवेदी (सीएमओ प्रभारी)
- डॉ. कौशलेन्द्र ठाकुर
- एनेस्थीसिया टीम
- बर्न यूनिट स्टाफ
सभी ने समन्वयपूर्वक भूमिका निभाई।
देशभर के मरीजों की पहली पसंद
डॉ. उदय कुमार के अनुसार बर्न यूनिट में ओडिशा, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार तक से मरीज आते हैं।
यहाँ
- आधुनिक सर्जिकल सुविधा
- संक्रमण नियंत्रण
- उच्च प्रोटीन आहार
- फिजियो और रिहैबिलिटेशन
उपलब्ध है, जिससे मरीज केवल जीवित ही नहीं रहते, बल्कि फिर से काम करने लायक बनते हैं।
उमेश की कहानी संवेदना और समर्पण की मिसाल
आज उमेश अपाहिज नहीं, आत्मनिर्भर है।
भिलाई इस्पात संयंत्र ने साबित किया है कि सही उपचार, मानवीय संवेदना और समर्पण किसी भी जीवन को नया अध्याय दे सकते हैं।








