
झालावाड़, 27 जुलाई।मनोहर थाना उपखंड के पिपलोदी गांव में स्कूल की छत गिरने से मारे गए मासूमों की चिताओं में सिर्फ लकड़ियां नहीं जलीं जला था हर दिल, हर आंख, हर उम्मीद। हादसे के बाद जब गांवों में शव पहुंचे तो कोहराम मच गया। परिजन बेसुध थे, मातम पसरा था। गांव में भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बीच 6 बच्चों का अंतिम संस्कार पिपलोदी गांव में और एक बच्ची प्रियंका का अंतिम संस्कार चांदपुरा भीलान में किया गया।
लेकिन प्रियंका के अंतिम संस्कार में जो दृश्य सामने आया, वह सरकारी लापरवाही की एक और भयावह तस्वीर बन गया। बरसात के कारण लकड़ियां इतनी गीली थीं कि चिता ने आग ही नहीं पकड़ी। नतीजा — ग्रामीणों को मजबूरन ज्वलनशील पदार्थों, पुराने टायरों, घास और कंडों का सहारा लेना पड़ा।
मुक्तिधाम में नहीं बुनियादी इंतजाम
चांदपुरा भीलान गांव में न तो सूखी लकड़ियों का भंडारण करने की व्यवस्था है और न ही मुक्तिधाम में छाया या पक्की संरचना। बरसात में सारी लकड़ियां भीग चुकी थीं। ग्रामीण घरों से लकड़ी लाए, लेकिन वह भीग चुकी थी। नतीजतन, अंतिम संस्कार के लिए उन्हें पेट्रोल, राल, और पुराने टायर जलाने पड़े।
सवाल खड़े करती यह तस्वीर
एक तरफ स्कूल की लापरवाही ने 7 मासूमों की जान ली, तो दूसरी तरफ बुनियादी ढांचे की कमी ने शोक को और भारी बना दिया। सवाल ये है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों के श्मशान घाटों में अब भी बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता नहीं है?
शोक से ज्यादा गुस्सा
गांववालों का कहना है कि हर बरसात में यही हाल होता है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। आज जब एक मासूम की चिता गीली लकड़ियों और जलते टायरों में बुझती रही, तब गांव की आंखें सिर्फ नम नहीं थीं — उनमें आंसुओं के साथ गुस्सा भी था।



