कोण्डागांव से बन्नूराम यादव की रिपोर्ट
कोंडागांव, 21नवंबर। सर्व समाज के द्वारा फिल्म माटी का प्रदर्शन किशोर टाकीज कोंडागांव के शुभारंभ के मुख्य अतिथि सुश्री लता उसेंडी जी उपाध्यक्ष बस्तर विकास प्राधिकरण एवं कोडागाँव के लोकप्रिय विधायक के द्वारा शुभारंभ किया गया इस अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष नरपति पटेल जी उपाध्यक्ष जसकेतु उसेडी जी ,दीपेश अरोरा भाजपा नेता एवं सर्व समाज के संरक्षक शांतिलाल सुराना ,आर के जैन , टांकेश पाणिग्रही ,अध्यक्ष धंसराज टंडन, उपाध्यक्ष मणि शंकर देवांगन, प्रवक्ता नीलकंठ शार्दुल , आर के बंजारे सलाहकार, एवं समाज प्रमुख मनोहर सिंह सगू , महेश पांडे, श्याम सिंह ठाकुर, खीरेंद्र यादव, सुरेंद्र मिश्रा, खेमा वैष्णो, राजेश सोना, प्रेम सिंह नाग पी एल ठावरे , सानू मारकंडे, शैलेश शुक्ला पत्रकार, तरुणनाग, संतोष पात्रे ,दीनु सेन, बनाऊ नाग, राजेश मानिकपुरी, प्रभु यादव, नेपाल सिंह ठाकुर, आदि समाज प्रमुख जनप्रतिनिधि पत्रकार नागरिक फिल्म माटी के शुभारंभ के अवसर पर उपस्थित रहे
“बस्तर केवल हिंसा का भूगोल नहीं है, यह संवेदनाओं, संघर्षों और सपनों की भूमि है” — यह कहना है समाजसेवी, पर्यावरण रक्षक और फ़िल्म ‘माटी’ के लेखक-निर्माता संपत झा का।
बस्तर की स्टोरी आधारित फ़िल्म ‘माटी’ दरअसल केवल एक फ़िल्म नहीं, बल्कि बस्तर की वो मुखर अभिव्यक्ति है, जिसकी प्रतिभा और संभावनाओं का दशकों तक नक्सलवाद ने दमन कर रखा था।
बस्तर की मिट्टी में जन्मे लोगो ने अपनी प्रतिभा से क्षेत्र को गौरवान्वित किया, उनके संजोए सपनों और वर्षों की तपस्या ने बस्तर का मान बढ़ाया। क्या आप जानते हैं कि ऐसी कितनी ही अप्रकट प्रतिभाएँ थीं — जिन्होंने सपने देखे, कोशिशें कीं, पर हिंसा के साए में उन्हें कुचल दिया गया।
झा कहते हैं — “हमने ऐसे सैकड़ों लोगों को जोड़ा जो बदलाव चाहते थे, जो अपने गांव, अपने जंगल और अपनी मिट्टी को लेकर कुछ सकारात्मक करना चाहते हमें धमकियाँ मिलीं। कई लोग शांति लाने के इस महा यज्ञ में स्वाहा हो गए लेकिन उनके नाम तक इतिहास के पन्नों में कहीं नहीं हैं। बस्तर की माटी अपने हृदय में उनकी यादों को संजोए रखती है जिन्होंने यहां शांति और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
‘माटी’ इन्हीं अनजान नायकों को पहचान देने का प्रयास है।
संपत झा बताते हैं कि फ़िल्म की प्रेरणा उन्हें उन्हीं ग्रामवासियों से मिली जो आज भी बस्तर में शांति और विकास की उम्मीद को जिंदा रखे हुए हैं।
उनके शब्दों में —
“बस्तर में शांति केवल पुलिस या प्रशासन से नहीं आएगी, यह तभी आएगी जब यहां का हर नागरिक खुद को इस माटी का रखवाला समझे। हमारी फ़िल्म इसी भाव को जगाने की कोशिश है।”
संपत झा, जिन्हें बस्तर में “ट्री मैन” या “वृक्ष मित्र” के नाम से भी जाना जाता है, ने पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकजुटता के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय काम किया है।
उन्होंने बताया कि फ़िल्म के हर फ्रेम में बस्तर की मिट्टी, उसकी संस्कृति, उसकी तकलीफ़ें और अनुपम सुंदरता को जिया गया है।
“हमने बस्तर को केवल कैमरे में नहीं कैद किया, हमने उसे महसूस किया। यह फ़िल्म उन सबकी है जिनकी आवाज़ दबा दी गई थी।”
‘माटी’ 21नवंबर को कोंडागांव के सिनेमाघर में प्रदर्शित की गई। जिसमे सर्व समाज के द्वारा बस्तर की फ़िल्म होने की वजह सें पहला प्रीमियर शो किया गया,
यह फ़िल्म बस्तर की उन कहानियों को उजागर करती है, जो कभी सुनी नहीं गईं — और ना अब तक कहने की हिम्मत ही की गई।








