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बालोद के डोंडी ब्लॉक में उर्वरक घोटाला: कन्हैया कृषि केंद्र पर अवैध भंडारण, प्रशासन की लापरवाही उजागर…

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बालोद से अंकित टाटिया की रिपोर्ट…

बालोद, छत्तीसगढ़।
कृषि और किसानों के नाम पर चलाई जा रही योजनाओं और नियमों की धज्जियाँ उड़ती दिखाई दे रही हैं। बालोद जिले के डोंडी ब्लॉक अंतर्गत चिखलाकसा गांव में स्थित कन्हैया कृषि केंद्र (प्रोप्राइटर – लक्ष्मीकांत उपाध्याय) में उर्वरकों का अवैध भंडारण कर बेधड़क संचालन किया जा रहा था। यह मामला न सिर्फ एक दुकान का है, बल्कि यह प्रशासनिक मिलीभगत और भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर करता है।

जब हमारे रिपोर्टर द्वारा इस गैर लाइसेंस के गोदाम में रखा गया है मॉल और अवैध भंडारण पर संबंधित कृषि अधिकारियों से सवाल किए गए तो जवाब में मिली केवल खानापूर्ति की कार्यवाही, जिसने पूरे तंत्र की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां गोदाम को पूर्णतः सील किया जाना चाहिए था, वहां केवल बिक्री पर रोक लगाकर मामले को दबाने की कोशिश की गई है।

किसान ठगा, अधिकारी मौन, नियम ताक पर..
ऐसे केंद्रों की अनुमति नवीनीकरण और संचालन के लिए कृषि विभाग की स्वीकृति आवश्यक होती है। लेकिन कन्हैया कृषि केंद्र के पास न तो वैध भंडारण की अनुमति थी और न ही उर्वरक अधिनियमों के अनुरूप दस्तावेज। इसके बावजूद यहां बड़े स्तर पर खाद और उर्वरकों का भंडारण किया जा रहा था।

प्रशासनिक अधिकारियों की आंखों के सामने चल रहे इस खेल में सवाल यह उठता है कि जब सब कुछ बिना अनुमति के चल रहा था, तो नियमित निरीक्षण क्यों नहीं हुआ? क्या यह सीधे तौर पर अधिकारियों की मिलीभगत नहीं दर्शाता?

कागज़ों में कार्रवाई, ज़मीन पर लाचारी…
इस घोटाले में सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि पूरे गोदाम को सील करने के बजाय केवल विक्रय पर प्रतिबंध लगाकर मामले को निपटा दिया गया। इससे यह साफ है कि कार्रवाई केवल कागजों पर की गई है, जबकि जमीनी स्तर पर अभी भी पूरा भंडार जस का तस रखा हुआ है।

यह कार्यप्रणाली यह दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी या तो जानबूझकर आंख मूंदे बैठे हैं, या फिर उनकी इस लापरवाही के पीछे कोई गहरी सांठगांठ है।

नियमों की धज्जियां और किसानों के साथ धोखा

उर्वरक नियंत्रण आदेश (Fertilizer Control Order) 1985 के अनुसार, बिना वैध लाइसेंस के उर्वरकों का भंडारण, परिवहन, वितरण व बिक्री पूरी तरह गैरकानूनी है। इस मामले में स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन हुआ है, फिर भी कार्रवाई नाम मात्र की हुई।

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ये खादें किसानों को उचित मूल्य और गुणवत्ता में दी जाती हैं, और यदि ये अवैध रूप से भंडारित हैं तो उनकी गुणवत्ता भी संदिग्ध हो सकती है। इसका सीधा प्रभाव किसानों की फसल और आय पर पड़ता है।




प्रशासनिक चुप्पी: भ्रष्टाचार या अक्षमता?

जब मीडिया ने इस मामले को उजागर किया, तब अधिकारियों को जवाब देना पड़ा। लेकिन जिस तरह से इस पूरे मामले को ‘हल्की कार्यवाही’ के नाम पर निपटाने की कोशिश की गई, वह सीधे तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि या तो प्रशासन में बैठे अधिकारी इस खेल में साझेदार हैं या फिर वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल हैं।


क्या मुख्यमंत्री तक पहुंचेगी आवाज?

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय बार-बार पारदर्शी प्रशासन की बात करते हैं, लेकिन अगर ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्यवाही नहीं हुई, तो यह नारा केवल मंचों की शोभा बनकर रह जाएगा।

सरकार को चाहिए कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच करवाई जाए, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो और किसान हितों की रक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जाए।


निष्कर्ष: अब और नहीं सहेंगे—जनता को चाहिए जवाब

चिखलाकसा का यह मामला कोई पहला या आखिरी नहीं है। ऐसे दर्जनों कृषि केंद्र प्रदेश में चल रहे हैं जो अवैध रूप से उर्वरक और बीजों का कारोबार कर रहे हैं। अगर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा।
अब वक्त आ गया है कि ऐसे भ्रष्ट केंद्रों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो। अन्यथा यह साबित हो जाएगा कि “कृषि” सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है, और “किसान” सिर्फ वोट बैंक।

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