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” शराब की दुकानों से सुसज्जित- नशा मुक्त भारत !”

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भिलाई की एक अद्भुत घटना सामने आई है, जहां एक सरकारी स्कूल में “नशा मुक्ति” को लेकर एक शानदार जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। मंच पर मौजूद अफसरों ने विद्यार्थियों को नशे के दुष्परिणामों से परिचित करवाया, बताया कि नशा पाप है, नशा से परिवार टूटते हैं, अपराध बढ़ते हैं, और जीवन अंधकारमय हो जाता है। सब बच्चे सिर झुकाकर बड़े ध्यान से सुन रहे थे — कुछ को शक था कि कहीं अगले पीरियड में अंग्रेज़ी का टेस्ट तो नहीं है, जो इतने लोग अचानक भाषण देने आ गए!



पर अफ़सोस की बात यह है कि स्कूल से मुश्किल से एक किलोमीटर के दायरे में तीन सरकारी शराब दुकानें, एक बियर बार, और दो ठेकेदार दोस्त पहले से ही इस “जनहितकारी अभियान” को धरातल पर चुनौती देने के लिए तैनात हैं।

सरकार की नीति भी कमाल की है। एक तरफ बच्चे को बताया जा रहा है कि “शराब पीना अपराध की ओर पहला कदम है”, दूसरी तरफ उसी मोहल्ले में ‘सरकारी शराब भंडार’ के होर्डिंग पर लिखा है:
“ठंडी बियर – गर्मी की शांति!”
और नीचे छोटा सा कैप्शन – “राज्य शासन द्वारा अनुमोदित”।

ये देखकर बच्चे भ्रमित हैं – सरकारी अंकल बोल रहे थे मत पीओ, लेकिन सरकारी दुकान बोल रही है आओ जी, पियो जी, घर लेकर जाओ जी!

एक नौजवान छात्र ने सवाल उठाया, “मैडम, अगर शराब से घर बर्बाद होते हैं तो ये दुकानें किसके लिए हैं?”

इस पर पुलिस अफसर थोड़ी देर चुप रहीं, फिर मुस्कुरा कर बोलीं – “ये बड़ों के लिए हैं बेटा, तुम तो सिर्फ अच्छे नागरिक बनो।”

अब बेचारा बच्चा समझ नहीं पा रहा कि जब बड़ा होकर उसे ये ‘बड़े’ काम करने ही हैं, तो अभी से क्यों नहीं?

शराब मुक्त या शराब युक्त?

छावनी थाना क्षेत्र को “नशा मुक्त क्षेत्र” बनाने की मुहिम जारी है, पर क्षेत्र के ही ‘ठेके’ दिन-ब-दिन नवीनीकृत हो रहे हैं। अब तो डिजिटल पेमेंट, ऐप पर होम डिलीवरी और कैशबैक ऑफर भी चालू हैं। यानी नशा भी, तकनीक भी — और विकास तो देखिए जनाब, अब शराब खरीदने पर पॉइंट्स भी मिलते हैं। दस बार पीओ, ग्यारहवीं बोतल फ्री!



यानी सरकार शराब बेच रही है, और पुलिस नशा छुड़ाने का सेमिनार ले रही है। एक तरफ ज़हर परोसना, दूसरी तरफ “ज़हर मत खाओ बेटा” कहना – यह विरोधाभास नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीतिक “संतुलन” है।

शिक्षक, छात्र और सरकारी ‘संवेदनशीलता’

कार्यक्रम में प्रिंसिपल भी मौजूद थे। उन्होंने कहा: “हम बच्चों को नैतिक शिक्षा दे रहे हैं, ताकि वो शराब से दूर रहें।” पर बच्चों ने देखा कि स्कूल के सामने जो नल है, उसके ठीक बगल में हर शाम पंचर बनवाने की आड़ में ठेके पर जश्न होता है।

शिक्षक बताते हैं – “शराब से परिवार बर्बाद हो जाते हैं।” वहीं सरकारी आँकड़े बताते हैं – शराब बिक्री से हर महीने सरकार को करोड़ों का राजस्व आता है। अब समझ नहीं आ रहा कि “बर्बादी” किसकी हो रही है और “कमाई” किसकी?

निष्कर्ष: मुहिम नहीं, मज़ाक

भिलाई का यह जागरूकता कार्यक्रम एक शानदार मिसाल है उस दोहरे चरित्र की, जिसे हम नीतिगत भाषा में “विकास का समावेशी मॉडल” कहते हैं। यहां शराब भी है, शिक्षा भी है। एक हाथ में बोतल, दूसरे में नैतिकता की किताब। जनता भ्रम में, सरकार धन्य है।

सवाल यह नहीं कि नशा बुरा है या नहीं — सवाल यह है कि जब खुद सरकार ठेके खोल रही है, ब्रांड प्रमोट कर रही है, और फिर उसी नशे से मुक्त कराने का भाषण दे रही है, तो जनता क्या करे?

सरकार कहती है — “मत पीओ, नुकसान है!”
फिर पीछे से कान में फुसफुसा देती है — “लेकिन अगर पीना ही है तो हमारे ठेके से ही लेना!”

क्योंकि देश तभी नशा मुक्त बनेगा, जब नशा सरकारी अनुमति से हो।

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