छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में बसा गाँव गोंडपेंड्री, एक समय अपनी हरियाली, मिट्टी की सोंधी खुशबू, और शांत माहौल के लिए जाना जाता था। गाँव के बच्चे आम के पेड़ों पर चढ़कर कैरियाँ तोड़ते, मिट्टी के घर बनाते और खेतों में तितलियों का पीछा करते। यह गाँव दुर्ग जिले की शान था, जहाँ हरियाली से मन को सुकून मिलता था।
गोंडपेंड्री में नंदी नहीं थी, लेकिन गाँव का हर कोना ऐसा था कि वहाँ खुशहाली नाचती हुई दिखती। सुबह-सुबह खेतों में हल की आवाज और पक्षियों की चहचहाहट, यहाँ के दिन की शुरुआत होती थी। लेकिन यह सब तब बदल गया जब गाँव के पास खदान खुली।
खदान ने गोंडपेंड्री की पहचान को धीरे-धीरे मिटाना शुरू कर दिया। जहाँ कभी खेतों की हरियाली लहलहाती थी, वहाँ अब सिर्फ पत्थर और धूल दिखाई देते हैं। बच्चों के खेल मैदान अब खदान की चहारदीवारी के अंदर गुम हो चुके हैं। बचपन की मासूमियत, जो तितलियों के पीछे भागने में थी, अब धूल और शोरगुल के बीच दबकर रह गई।
गाँव के बुजुर्ग अकसर कहते हैं, “हमने सोचा था कि खदान से रोजगार आएगा, लेकिन इसने हमारे बच्चों से उनका बचपन छीन लिया। न वे अब खुले आसमान के नीचे खेल सकते हैं, न ही खेतों में भाग सकते हैं। यह खदान हमारे सपनों का सौदा कर रही है।”
खदान की खुदाई ने सिर्फ जमीन की गहराई को नहीं बदला, बल्कि गोंडपेंड्री के दिल में भी गहरी चोट छोड़ी है। बच्चे अब मिट्टी में खेलने के बजाय घरों में कैद हो गए हैं, और गाँव की हरियाली, जो कभी उसकी पहचान थी, अब सिर्फ यादों में बची है।
संदेश: गोंडपेंड्री की कहानी हमें यह सिखाती है कि असली विकास वही है, जो हमारी जड़ों और संसाधनों को सुरक्षित रखे। अगर हम अपनी मिट्टी, हरियाली, और बचपन को नहीं बचाएंगे, तो हमारा भविष्य सिर्फ खोखला होगा।








