ब्यूरो चीफ बन्नूराम यादव कोंडागांव । कोंडागांव जिला भौगोलिक दृष्टि से वर्षा आधारित एवं आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां लंबे समय से धान एवं कुछ सीमित फसलों की खेती की जाती रही है। इससे किसानों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता। इसी को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, कोंडागांव द्वारा कसावा फसल की खेती एवं मूल्य संवर्धन पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 01 फरवरी 2026 (रविवार) को किया गया।
इस प्रशिक्षण में केशकाल विकासखंड के अमोडा, डोंगईपारा, सलेभाट, सिंकागांव एवं चेरबेडा ग्रामों के 56 किसानों ने भाग लिया।
कम संसाधनों में अधिक उत्पादन वाली फसल है कसावा
कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. सुरेश कुमार मरकाम ने किसानों को कसावा फसल के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कसावा ऐसी फसल है जो कम पानी, कम उर्वरक एवं सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।
कसावा से स्टार्च, टैपिओका, आटा, चिप्स, खाद्य उत्पाद एवं पशु आहार जैसे अनेक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
उन्होंने कसावा की आर्थिक उपयोगिता, मूल्य संवर्धन की संभावनाओं एवं इसके माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने के विषय में विस्तार से जानकारी दी।
ग्रामीण व आदिवासी किसानों के लिए आर्थिक अवसर
इस अवसर पर ग्राम सरपंच श्रीमती चंद्रकला सरकार ने कसावा की खेती को ग्रामीण एवं आदिवासी किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
वहीं जिला महिला मुक्ति मोर्चा की अध्यक्ष श्रीमती सोमा दास ने इसे महिला किसानों एवं स्वयं सहायता समूहों के लिए आजीविका का सशक्त साधन बताया।
श्री जया किस्म से पोषण सुरक्षा को मिलेगा बल
केंद्र के शस्य वैज्ञानिक श्री भूपेन्द्र ठाकुर ने कसावा की उन्नत किस्म ‘श्री जया’ के पोषण गुणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह किस्म विटामिन-ए से भरपूर, शीघ्र तैयार होने वाली फसल है, जो आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या को कम करने में सहायक हो सकती है।
उन्होंने फसल प्रबंधन, निराई-गुड़ाई एवं रोग नियंत्रण से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया।
आधुनिक तकनीक से घटेगी लागत, बढ़ेगा उत्पादन
कार्यक्रम में फार्म मशीनरी वैज्ञानिक डॉ. प्रिया सिन्हा ने कसावा की कटिंग लगाने की वैज्ञानिक विधि, उचित रोपण दूरी, भूमि की तैयारी एवं मशीनों के उपयोग से खेती के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीकों के उपयोग से श्रम लागत में कमी आती है और उत्पादन में वृद्धि संभव है।
राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन के तहत 15 हेक्टेयर में खेती
नवीन किस्म के साथ नवाचार
डॉ. सुरेश मरकाम ने बताया कि राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन (NHM) के अंतर्गत लगभग 15 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों के खेतों पर कसावा की खेती कराई जा रही है।
कसावा (Cassava/टैपिओका), जिसे स्थानीय भाषा में “आलू कांदा” कहा जाता है, सामान्यतः उबालकर खुले बाजार में बेची जाती है।
इस परियोजना के तहत किसानों को कसावा कटिंग, दवाइयां, जैविक खाद एवं समूह के रूप में मशीनें उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे किसान इस नवाचार से स्थायी रूप से जुड़ सकें।
कम प्रतिस्पर्धा और अधिक लाभ वाली फसल : विशेषज्ञ
कार्यक्रम में विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. हितेश मिश्रा ने बताया कि कसावा जिले में एक कम प्रतिस्पर्धी एवं अधिक लाभ देने वाली फसल है।
उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण, पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से कसावा जैसी वैकल्पिक फसलों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।








