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पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान का होगा दस्तावेजीकरण, औषधीय पौधों के संरक्षण पर जोर

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309 पारंपरिक वैद्यों को मिले स्वैच्छिक प्रमाण पत्र, 31 मार्च 2027 तक एक हजार वैद्यों के प्रमाणन का लक्ष्य

ब्यूरो चीफ बन्नूराम यादव कोण्डागांव। कोण्डागांव, छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा कोण्डागांव के ऑडिटोरियम में पारंपरिक वैद्य स्वैच्छिक प्रमाणन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में प्रदेश के 309 पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान कर उनके पारंपरिक ज्ञान, अनुभव और सेवाभाव का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का संरक्षण, वैद्यराजों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण तथा औषधीय पौधों के संरक्षण एवं संवर्धन को बढ़ावा देना रहा।

कार्यक्रम में वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं कोण्डागांव विधायक सुश्री लता उसेंडी तथा बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री अंजय शुक्ला विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

परंपरागत चिकित्सा ज्ञान हमारी अमूल्य विरासत : केदार कश्यप

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान करना हर्ष का विषय है। हमारी जड़ें जितनी मजबूत होंगी, हमारी संस्कृति और परंपराएं उतनी ही समृद्ध होंगी। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को पीढ़ियों से सहेजकर रखने वाले वैद्यराजों का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आज भी दुनिया की 80 प्रतिशत जनता प्राचीन उपचार पद्धतियों से चिकित्सा करा रही है।

मंत्री ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों का ज्ञान प्राकृतिक अनुभवों, वनस्पतियों की पहचान और पीढ़ियों से अर्जित समझ पर आधारित है। इस ज्ञान को केवल औपचारिक शिक्षा और डिग्रियों के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसलिए वैद्यराजों के अनुभवों और औषधीय वनस्पतियों से जुड़ी जानकारी का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण आवश्यक है, ताकि यह अमूल्य विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।

औषधीय पौधों के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर

श्री कश्यप ने कहा कि हमारे आसपास उपलब्ध अनेक पेड़-पौधों, फल-फूलों, जड़ों और वन उत्पादों में उपयोगी गुण पाए जाते हैं। पहले ग्रामीण जीवन में इनका उपयोग खान-पान और पारंपरिक उपचार में सहज रूप से किया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण इनसे दूरी बढ़ रही है। आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को फिर से पहचाना जाए तथा उनके वैज्ञानिक अध्ययन और उचित उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए।

उन्होंने अधिकारियों से पंचायतों की उपलब्ध भूमि, घरों की बाड़ियों और अन्य उपयुक्त स्थानों पर फलदार वृक्षों के साथ औषधीय पौधों का रोपण प्रोत्साहित करने की अपील की। इससे औषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता बढ़ेगी और उनके संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।

मिलेट्स और पारंपरिक खान-पान को बढ़ावा देने की अपील

वन मंत्री ने कहा कि कोदो, कुटकी, रागी सहित अन्य पारंपरिक मोटे अनाज हमारी खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। आज इनके पोषण संबंधी महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी मिलेट्स के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भोजन में स्वाद के साथ उसके पोषण मूल्य और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी महत्व देना चाहिए। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों से पारंपरिक खाद्य संस्कृति, स्थानीय सब्जियों और विलुप्त होती खान-पान की परंपराओं को फिर से पहचानने का अवसर मिलता है।

स्थानीय वन उत्पादों से बढ़ेंगे आजीविका के अवसर

श्री कश्यप ने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ स्थानीय संसाधनों के माध्यम से आजीविका संवर्धन पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि औषधीय पौधों, स्थानीय वन उत्पादों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं उपयोगिता के आधार पर बेहतर ब्रांडिंग, प्रसंस्करण और विपणन किया जा सकता है। इससे स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार मिलेगा और ग्रामीण समुदायों के लिए रोजगार एवं आय के नए अवसर विकसित होंगे।

उन्होंने साल बीज सहित अन्य वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन की संभावनाओं पर भी कार्य करने का आग्रह किया।

मार्च 2027 तक एक हजार पारंपरिक वैद्यों के प्रमाणन का लक्ष्य

बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय और वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में पारंपरिक वैद्यों के प्रमाणन और उनके ज्ञान के दस्तावेजीकरण की दिशा में पहल की गई है। शासन का उद्देश्य दूरस्थ वनांचलों में पारंपरिक वैद्यराजों की भूमिका को पहचान देना तथा उनके अनुभव और सेवाओं को उचित प्रोत्साहन प्रदान करना है।

उन्होंने बताया कि बोर्ड द्वारा विभिन्न वन मंडलों और जिलों में बैठकें आयोजित कर पारंपरिक वैद्यों से संवाद किया गया। इन बैठकों में उनके अनुभवों, समस्याओं और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के संरक्षण से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। इसी प्रक्रिया के तहत प्रथम चरण में 309 वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान किए जा रहे हैं। बोर्ड का लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक प्रदेश के एक हजार पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन पूरा करना है।

श्री मरकाम ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से हुई मुलाकात का उल्लेख करते हुए कहा कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और सेवा परंपरा को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

औषधीय वनस्पतियों का समुचित दोहन जरूरी

बोर्ड अध्यक्ष ने पारंपरिक वैद्यों से निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं जारी रखने और औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उन्होंने बताया कि वन विभाग के अधिकारियों और पारंपरिक वैद्यों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए जिलों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य औषधीय वनस्पतियों की पहचान, संग्रहण और संरक्षण के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना है।

उन्होंने कहा कि औषधीय पौधों का संग्रहण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनकी प्राकृतिक वृद्धि प्रभावित न हो। वनस्पतियों के अंधाधुंध दोहन के बजाय उनका समुचित उपयोग और संरक्षण जरूरी है, ताकि भविष्य में भी ये प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध रह सकें।

पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी : लता उसेंडी

बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं विधायक सुश्री लता उसेंडी ने कहा कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के साथ बीमारियों की रोकथाम और स्वस्थ जीवनशैली के लिए पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों तथा संतुलित खान-पान के महत्व को समझना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज स्थानीय अनाज, वन उपज और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को दैनिक जीवन में महत्व देते थे। समय के साथ खान-पान की आदतों में बदलाव आया और पारंपरिक खाद्य पदार्थों का उपयोग कम होता गया। आज कोदो, कुटकी और रागी जैसे अनाज के पोषण संबंधी महत्व को फिर से पहचाना जा रहा है। इन्हें दैनिक भोजन में स्थान देने और इनके प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

सुश्री उसेंडी ने कहा कि पूर्वजों ने औषधीय वनस्पतियों और उनके उपयोगों का ज्ञान अपने अनुभवों के आधार पर संजोकर रखा था। इस ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले सभी वैद्यों को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि वे स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के प्रयास

बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री अंजय शुक्ला ने पारंपरिक एवं आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियों के संरक्षण, वैद्यराजों के कल्याण तथा उनके ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए शासन द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैद्यों की पहचान, प्रमाणन और उनके अनुभवों के संरक्षण की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है।

जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में वैद्य रहे उपस्थित

कार्यक्रम में पूर्व विधायक श्री सेवकराम नेताम, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती रीता शोरी, नगर पालिका अध्यक्ष श्री नरपति पटेल, राज्य तीरंदाजी संघ के उपाध्यक्ष श्री दीपेश अरोरा, श्री जितेन्द्र सुराना, श्री अश्वनी पाण्डेय, श्री प्रवीण सांखला, सुश्री सोनामणि पोयाम, बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री जे.सी.एस. राव, वन मंडलाधिकारी श्री चूड़ामणि सिंह, सीटीटीसी के डायरेक्टर श्री मोहन नायर सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि, संबंधित विभागों के अधिकारी और बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्य उपस्थित रहे।

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