कागजों में तैयार लेआउट, जमीन पर नहीं दिखी एक भी ईंट

पितेश्वर हरपाल गरियाबंद । जिले के छुरा विकासखंड में प्रधानमंत्री जनमन आदिवासी योजना के तहत प्रस्तावित आंगनबाड़ी भवन का लेआउट कागजों में पूरा हो चुका है, लेकिन निर्माण कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया।
जिन बच्चों के लिए यह भवन स्वीकृत हुआ था, वे आज भी जर्जर, अस्तबलनुमा ढांचे में दिन गुजारने को मजबूर हैं।
कोकडाछेड़ा (हिराबत्तर) के बच्चे स्कूल की दीवारों के सहारे
आश्रित ग्राम कोकडाछेड़ा में आंगनबाड़ी केंद्र स्कूल के ही दो कमरों में आधा-आधा बांटकर चलाया जा रहा है।
एक ही कमरे में कई कक्षाओं का संचालन शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
एक शिक्षक के अनुसार
“एक कमरे में पांच क्लास चलाना बच्चों के भविष्य के साथ समझौता है।”
ग्रामीणों का आरोप भवन फाइलों में, जमीन पर कुछ नहीं
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण सिर्फ कागजों में है।
ना नींव दिखती है, ना ईंट।
स्थिति वर्षों से जस की तस बनी हुई है।
अधिकारी बोले प्रस्ताव पारित, पर काम शुरू नहीं
सेक्टर पर्यवेक्षक कौशल वर्मा ने स्वीकार किया कि प्रस्ताव उच्च अधिकारियों को भेजा गया था और दस्तावेजों में पारित भी है, परंतु निर्माण शुरू नहीं हो पाया।
जिला गरियाबंद के सहायक आयुक्त (निर्माण शाखा) के अनुसार
निर्माण का टेंडर शांति ट्रेडर्स को दिया गया है, पर प्रगति रिपोर्ट आज तक नहीं आई।
निर्माण एजेंसी की निष्क्रियता और विभागीय समन्वय की कमी उजागर
सरकारी दस्तावेजों और वास्तविक कार्य में बड़ा अंतर सामने आया है।
विभागीय संवाद कमजोर है और निर्माण एजेंसी निष्क्रिय।
परिणाम योजना कागजों से आगे बढ़ नहीं पाती।
यह सिर्फ एक भवन नहीं, व्यवस्था का आईना
आंगनबाड़ी भवन के निर्माण में देरी केवल एक ढांचा बनने का मुद्दा नहीं है,
बल्कि यह दर्शाता है कि प्रशासनिक पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही की कमी किस तरह विकास योजनाओं को पंगु कर देती है।
गांव का भविष्य सवालों में फाइलों की इमारतें हकीकत कब बनेंगी?
कोकडाछेड़ा जैसे पिछड़े गांवों के बच्चों का भविष्य अभी भी इंतजार में है।
जब तक विभाग सक्रिय नहीं होते और ठेकेदारों पर सख्ती नहीं आती,
फाइलों में बनी इमारतें हकीकत के रूप में कब खड़ी होंगी—यह बड़ा सवाल है।








