ब्यूरो नूतन साहू गरियाबंद ! रक्षाबंधन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अब गांव की महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की नई पहचान बन गया है। गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड अंतर्गत अमलीपदर संकुल की स्व-सहायता समूह की महिलाएं इस पावन पर्व को आजीविका से जोड़कर एक मिसाल कायम कर रही हैं।
इन समूह की मेहनती और रचनाशील दीदियों द्वारा रेशम के धागे, धान, चावल, मूंग, मोती और पारंपरिक सजावटी सामग्री से हस्तनिर्मित, पर्यावरण-सुरक्षित राखियाँ तैयार की जा रही हैं। यह राखियाँ जहां बहन-भाई के प्रेम की डोर को मजबूत कर रही हैं, वहीं महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त भी बना रही हैं।
स्थानीय बाजार में बढ़ती मांग
इन राखियों की मांग स्थानीय बाजार में तेजी से बढ़ी है। स्वयं समूह की महिलाएं ही इनकी बिक्री कर रही हैं और साथ ही यह राखियाँ महिलाओं द्वारा संचालित दुकानों में भी उपलब्ध हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है और सामूहिकता, रचनात्मकता व आत्मविश्वास जैसी भावनाओं का भी विकास हो रहा है।
परंपरा और प्रगति का संगम
यह पहल न केवल लोककला और संस्कृति को जीवित रखने का काम कर रही है, बल्कि गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी दिखा रही है। रक्षासूत्र अब केवल प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह गांव की महिलाओं की मेहनत, हुनर और सफलता की पहचान बन चुका है।
मैनपुर की राखियाँ बनीं महिलाओं की पहचान








