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कांटो से भरे खजूर पेड़ पर नंगे पैर चढ़कर, फिर नृत्य करते हैं शिवभक्त

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कोण्डागांव से बन्नूराम यादव की रिपोर्ट

आस्था विश्वास और पवित्र संस्कार के साथ शुरू हुआ चरक पूजा।

कोण्डागांव ! फरसगांव ब्लाक के पश्चिम बोरगांव में रविवार को आस्था विश्वास और पवित्र संस्कार के साथ शुरू हुआ चरक पूजा यानी नील पूजा। क्षेत्र में इस समय बोलबम के उद्घोष के साथ भक्तिमय माहौल की धूम मची हुई है। बंगाली बाहुल्य क्षेत्र पश्चिम बोरगांव में चरक पूजा की तैयारी पूरी कर आज खेजूर भांगा पर्व मनाया गया जो चरक पूजा के एक दिन पूर्व मनाया जाने वाला पर्व है।

खेजूर भांगा पर्व देखने उमड़ी भीड़ _

चरक पूजा के एक दिन पहले 13 अप्रैल रविवार को खजूर भांगा महोत्सव का आयोजन हुआ जिसका इंतजार लोग बेसब्री से कर रहे थे। शिवभक्त की टोलियों से सदस्य गंगा जल से स्नान कर गेरुआ वस्त्र धारण कर कटीले खजूर पेड़ में बिना किसी सहारे चढ़ गए तथा नृत्य करते हुए पेड़ पर लगी कच्चे खजूर की डालियों को तोड़ नीचे फेंकते रहे। खजुर पेड़ के नीचे चारों ओर खड़े श्रद्धालु ऊपर से फेंके खजूर फल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते रहे। जिसे देखने के लिए आसपास के गांवों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और पर्व का आनंद उठाया।

बता दें कि यह दिन शिवभक्तों का भिक्षा मांगने का आखिरी दिन होता है। इसके एक दिन बाद यानी आज शिवभक्त अपने पीठ में रस्सी से लोहे की हुक लगा चरक पर्व मनाएंगे। चरक पूजा में वही भक्त शामिल होते हैं जो महीने भर उपवास रहते हैं।

बंग समुदाय का सबसे कठिन व्रत में से एक है चरक पूजाः

चरक पूजा में मान्यता है कि इस चरक पूजा के दौरान संन्यासी चैत्र माह के पूरे 30 दिन तक व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। यहां व्रत चरक पूजा के दिन समाप्त हो जाते हैं। मान्यता के अनुसार चरक पूजा सबसे कठिन व्रत में से एक है। जिसके लिए पूरे चैत्र माह भगवा वस्त्र धारी सन्यासी अपने समस्त सुख सुविधाएं त्यागकर ब्रह्माचार्य का पालन करते हुए भूखे प्यासे नंगे पैर रहकर दिन भर शिव पार्वती के रूप में सज धज कर नाचते गाते गांव गांव में घूमते हुए भिक्षा मांगते हैं और उनसे भिक्षा आदि मांग कर रात को एक बार उबला हुआ सात्विक भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। 

शिव जी को प्रसन्न करने करते हैं विशेष आराधना–

जानकार लक्ष्मण विश्वास बताते है चैत्र महीना बंग समुदाय के कैलेंडर का आखिरी महीना होता है। उसके बाद वैसाख महीना से बंग समुदाय के नव वर्ष का आगाज होता है। इसलिए साल के आखिरी चैत्र महीना के पहले दिन से ही बंग समुदाय के लोग शिव भगवान को प्रसन्न करने के लिए विशेष आराधना करते है। इसमें पूरे एक माह तक नंगे पैर गेरुआ वस्त्र धारण कर कठोर तपस्वी जीवन यापन किया जाता है। यहां तक कि भिक्षा मांगकर एक पहर का शाकाहार भोजन करते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं।

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